एक काफ्फी की दुकान
था उसमे मैं परेशां
टेबल पर था मोबाइल
मेरे चहरे में न था कोई स्मिले
टेबल पर था मैं बैठा
सोच रहा था मैं क्यों ऐसा
सपनो से बहार क्यों नहीं आता
सपनो में ही क्यों मैं रहता
रहती है कहीं एक लड़की
सोचती बिलकुल मेरे जैसी
लड़ कर जीना चाहती है वोह
फिर भी न जाने क्यों डरती है वोह
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