एक काफ्फी की दुकान
था उसमे मैं परेशां
टेबल पर था मोबाइल
मेरे चहरे में न था कोई स्मिले
टेबल पर था मैं बैठा
सोच रहा था मैं क्यों ऐसा
सपनो से बहार क्यों नहीं आता
सपनो में ही क्यों मैं रहता
रहती है कहीं एक लड़की
सोचती बिलकुल मेरे जैसी
लड़ कर जीना चाहती है वोह
फिर भी न जाने क्यों डरती है वोह
Monday, May 30, 2011
Sunday, May 29, 2011
New Poem 2
है एक और ज़िंदगी की ज़रुरत
लगता है कुछ सपने अधूरे रह जायेंगे
हसरतें रह जाएँगी अधूरी
सपने न हो पाएंगे पुरे
इस रफ़्तार भरी ज़िंदगी में
तंग होती जा रही है फुर्सत
कम होने लगे हैं अब आशाएं
ख़तम होती जरी है सब हसरत
लगता है कुछ सपने अधूरे रह जायेंगे
हसरतें रह जाएँगी अधूरी
सपने न हो पाएंगे पुरे
इस रफ़्तार भरी ज़िंदगी में
तंग होती जा रही है फुर्सत
कम होने लगे हैं अब आशाएं
ख़तम होती जरी है सब हसरत
My New poem
दो पैसे की धुप चार आने की बारिश
है बस यह ज़िंदगी
बस इतनी सी है मेरी ख्वाइश
पल में टूटती पल में बिखरती
पल में सदियों का साथ यह देती
यह दो लम्हों की ज़िंदगी
यह मेरी ज़िंदगी
समय का यूँ रोज़ बदलना
उमीदों से रोज़ मिलना
पुराने अख़बारों से लिपटी
हर रोज़ नयी उमीदों की यह ज़िंदगी
कभी तूफ़ान कभी बारिश
कभी आसमान चूमने की ख्वाइश
सितारों पे कदम रखूं
आपनी तोह बस येही ख्वाइश
ज़रूरत एक और ज़िंदगी की
ना इसमें पूरी होगी यह ख्वाइश
ना जाने हम फिर आयें ना आयें
चलो आभी कदम उठाएं
तमन्ना पूरी करनी है
साथ हम सब कदम उठाएं
है बस यह ज़िंदगी
बस इतनी सी है मेरी ख्वाइश
पल में टूटती पल में बिखरती
पल में सदियों का साथ यह देती
यह दो लम्हों की ज़िंदगी
यह मेरी ज़िंदगी
समय का यूँ रोज़ बदलना
उमीदों से रोज़ मिलना
पुराने अख़बारों से लिपटी
हर रोज़ नयी उमीदों की यह ज़िंदगी
कभी तूफ़ान कभी बारिश
कभी आसमान चूमने की ख्वाइश
सितारों पे कदम रखूं
आपनी तोह बस येही ख्वाइश
ज़रूरत एक और ज़िंदगी की
ना इसमें पूरी होगी यह ख्वाइश
ना जाने हम फिर आयें ना आयें
चलो आभी कदम उठाएं
तमन्ना पूरी करनी है
साथ हम सब कदम उठाएं
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